संक्षेप में: जमानत (bail) कितने दिन में मिलेगी, इसका कोई तय जवाब नहीं है। जमानती अपराध में अक्सर उसी दिन थाने या कोर्ट से जमानत मिल जाती है। गैर-जमानती अपराध में अर्जी लगने के बाद कोर्ट पुलिस से जवाब (say) मांगता है, इसलिए आम तौर पर कुछ दिन से लेकर कुछ हफ्ते लगते हैं, और गंभीर मामलों में इससे ज़्यादा भी। जमानत के लिए पुलिस को कोई पैसा नहीं दिया जाता; बॉन्ड और ज़मानत कोर्ट के आदेश के अनुसार कोर्ट में दी जाती है।

गिरफ्तारी के बाद पहले 24 घंटे: क्या होता है

किसी को गिरफ्तार किए जाने के बाद परिवार सबसे पहले यही जानना चाहता है कि वह कहाँ है और कब कोर्ट में पेश होगा। कानून कुछ बातें साफ़ तौर पर कहता है:

  • 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी: पुलिस किसी व्यक्ति को कोर्ट के आदेश के बिना 24 घंटे से ज़्यादा हिरासत में नहीं रख सकती (यात्रा का समय छोड़कर)। यह धारा 58 BNSS (पुरानी धारा 57 CrPC) और संविधान के अनुच्छेद 22(2) में है।
  • परिवार को सूचना का अधिकार: गिरफ्तार करने वाली पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति के किसी रिश्तेदार या दोस्त को गिरफ्तारी और जगह की जानकारी देनी होती है (धारा 48 BNSS, पुरानी धारा 50A CrPC)।
  • वकील से मिलने का अधिकार: पूछताछ के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति अपने वकील से मिल सकता है, हालाँकि पूरी पूछताछ के दौरान वकील साथ नहीं रहता।

पुलिस कस्टडी (PCR) बनाम न्यायिक कस्टडी (MCR)

पहली पेशी पर पुलिस अक्सर रिमांड मांगती है। महाराष्ट्र में इसे आम बोलचाल में PCR और MCR कहते हैं:

कस्टडी व्यक्ति कहाँ रहता है जमानत पर असर
पुलिस कस्टडी (PCR) थाने के लॉकअप में, पुलिस पूछताछ करती है व्यवहार में जमानत की सुनवाई अक्सर PCR खत्म होने के बाद होती है
न्यायिक कस्टडी (MCR) जेल में (पुणे में आम तौर पर यरवडा जेल) इस दौरान जमानत अर्जी पर सुनवाई सामान्य रूप से होती है

रिमांड कैसे दी जाती है और उसका विरोध कैसे किया जाता है, यह हमारे पुलिस कस्टडी और रिमांड पेज पर विस्तार से है। गिरफ्तारी के बाद के पूरे कदम गिरफ्तारी के बाद जमानत गाइड में भी हैं।

जमानत के प्रकार और कौन सा कोर्ट

स्थिति कानूनी प्रावधान कहाँ से जमानत
जमानती अपराध (bailable offence) धारा 478 BNSS (पुरानी 436 CrPC) थाने से या मजिस्ट्रेट कोर्ट से, यह अधिकार के रूप में मिलती है
गैर-जमानती अपराध (non-bailable), मजिस्ट्रेट द्वारा सुनवाई योग्य धारा 480 BNSS (पुरानी 437 CrPC) मजिस्ट्रेट कोर्ट (JMFC)
गंभीर अपराध या मजिस्ट्रेट द्वारा अर्जी खारिज धारा 483 BNSS (पुरानी 439 CrPC) सेशन्स कोर्ट, शिवाजीनगर (पुणे); उसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट (मुंबई)
तय समय में चार्जशीट दाखिल न हो धारा 187 BNSS (पुरानी 167 CrPC) डिफ़ॉल्ट बेल, उसी कोर्ट से जहाँ रिमांड चल रही है
गिरफ्तारी से पहले धारा 482 BNSS (पुरानी 438 CrPC) अग्रिम जमानत (anticipatory bail): सेशन्स कोर्ट या हाई कोर्ट

ध्यान दें कि पुणे में बॉम्बे हाई कोर्ट की कोई बेंच नहीं है; हाई कोर्ट के मामले मुंबई में चलते हैं।

डिफ़ॉल्ट बेल: अगर व्यक्ति कस्टडी में है और पुलिस 60 दिन (कुछ अपराधों में 90 दिन) के अंदर चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो उसे जमानत मांगने का अधिकार मिल जाता है, बशर्ते आरोपी चार्जशीट दाखिल होने से पहले अर्जी दे और ज़मानत देने को तैयार हो। ज़्यादा जानकारी डिफ़ॉल्ट बेल पेज पर है।

जमानत कितने दिन में मिलती है: ईमानदार समय-सीमा

नीचे दी गई सीमाएँ सिर्फ़ आम अनुभव पर आधारित अंदाज़ा हैं, कोई गारंटी नहीं। हर कोर्ट, हर मामला और हर दिन की सूची (board) अलग होती है।

  • जमानती अपराध: अक्सर उसी दिन, थाने में या पहली पेशी पर।
  • मजिस्ट्रेट कोर्ट में गैर-जमानती अपराध: अर्जी लगने पर कोर्ट पुलिस का जवाब (say) मांगता है। आम तौर पर कुछ दिन से एक-दो हफ्ते।
  • सेशन्स कोर्ट: सरकारी वकील और जाँच अधिकारी का जवाब आने में समय लगता है। कई मामलों में एक से तीन-चार हफ्ते लगते हैं।
  • हाई कोर्ट: मामला सूची में लगने पर निर्भर है; इसमें हफ्तों से लेकर महीनों तक लग सकते हैं।

समय इन बातों पर निर्भर करता है: अपराध कितना गंभीर है, PCR कितने दिन की है, पुलिस का जवाब कब आता है, शिकायतकर्ता विरोध करता है या नहीं, आरोपी का पिछला रिकॉर्ड, और कोर्ट की छुट्टियाँ। जमानत आदेश होने के बाद भी बॉन्ड भरने, ज़मानतदार की जाँच और जेल तक रिलीज़ ऑर्डर पहुँचने में एक-दो दिन लग सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI (2022) में कहा है कि जमानत अर्जियों का निपटारा जल्दी होना चाहिए और “जमानत नियम है, जेल अपवाद” का सिद्धांत दोहराया है। यह सिद्धांत मदद करता है, लेकिन हर मामले का फैसला उसके अपने तथ्यों पर होता है।

खर्च: बेल बॉन्ड, ज़मानतदार और वकील की फीस किन बातों पर निर्भर

लोग अक्सर पूछते हैं कि “जमानत में कितना पैसा लगता है”। यहाँ तीन अलग चीज़ें हैं, जिन्हें मिलाना नहीं चाहिए:

  1. बेल बॉन्ड या मुचलका (bond): यह आरोपी का लिखित वचन है कि वह हर तारीख पर हाज़िर रहेगा। इसमें कोर्ट एक रकम तय करता है। यह रकम आम तौर पर तभी चुकानी पड़ती है जब शर्तें तोड़ी जाएँ।
  2. ज़मानत (surety) या नकद ज़मानत: कोर्ट एक या दो ज़मानतदार मांग सकता है, जो उतनी रकम की ज़िम्मेदारी लेते हैं। कई बार कोर्ट ज़मानतदार की जगह नकद ज़मानत (cash security) जमा करने की अनुमति देता है। यह रकम कोर्ट में जमा होती है और केस खत्म होने पर नियम के अनुसार वापस मांगी जा सकती है।
  3. वकील की फीस: यह अलग है और कोर्ट (मजिस्ट्रेट, सेशन्स, हाई कोर्ट), अपराध की गंभीरता, कागज़ों की मात्रा, सुनवाइयों की संख्या और तात्कालिकता पर निर्भर करती है। हम यहाँ कोई रकम नहीं बताते; किन बातों से फीस तय होती है, यह पुणे में क्रिमिनल वकील की फीस पेज पर समझाया गया है।

कोर्ट को बॉन्ड की रकम तय करते समय आरोपी की आर्थिक स्थिति भी देखनी होती है। अगर आरोपी ज़मानत की शर्त पूरी नहीं कर पा रहा है, तो रकम या शर्त घटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी जा सकती है।

ज़रूरी डॉक्यूमेंट की चेकलिस्ट

आरोपी से जुड़े कागज़:

  • FIR की कॉपी (FIR नंबर, थाना, धाराएँ)
  • गिरफ्तारी मेमो और रिमांड ऑर्डर की कॉपी, अगर मिली हो
  • आधार कार्ड, पैन कार्ड या कोई और फोटो पहचान पत्र
  • पते का प्रमाण: किराया-नामा, बिजली बिल या राशन कार्ड
  • नौकरी या काम का प्रमाण: सैलरी स्लिप, कंपनी का आईडी या पत्र
  • मेडिकल कागज़, अगर बीमारी के आधार पर जमानत मांगनी हो
  • पहले से कोई केस हो तो उसकी स्थिति की जानकारी

ज़मानतदार (surety) से जुड़े कागज़:

  • आधार कार्ड और पासपोर्ट साइज़ फोटो
  • स्थानीय पते का प्रमाण
  • संपत्ति का प्रमाण, जैसे 7/12 उतारा या प्रॉपर्टी कार्ड, या आय का प्रमाण, जैसे सैलरी स्लिप या आयकर रिटर्न
  • कुछ मामलों में कोर्ट सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट मांग सकता है

कौन से कागज़ चाहिए, यह कोर्ट के आदेश पर निर्भर है, इसलिए आदेश की शर्तें ध्यान से पढ़ें।

जमानत खारिज हो जाए तो

  • ऊपर के कोर्ट में जाएँ: मजिस्ट्रेट से अर्जी खारिज हो, तो सेशन्स कोर्ट में धारा 483 BNSS के तहत अर्जी दी जा सकती है। सेशन्स से खारिज होने पर बॉम्बे हाई कोर्ट जाया जा सकता है।
  • नई परिस्थितियाँ: चार्जशीट दाखिल हो जाना, जाँच पूरी हो जाना, सह-आरोपी को जमानत मिलना, लंबी कस्टडी या स्वास्थ्य की समस्या, ये सब नई अर्जी का आधार बन सकते हैं।
  • खारिज आदेश की कॉपी लें और उसमें दिए कारण पढ़ें; अगली अर्जी उन्हीं कारणों का जवाब देती है।

जमानत अर्जी कैसे तैयार होती है, इसके लिए हमारा जमानत अर्जी (bail application) पेज देखें।

संबंधित:

अगर आपको अपनी स्थिति पर सलाह चाहिए, तो आप ऑफिस से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या थाने से ही जमानत मिल सकती है?

जमानती अपराध में हाँ। पुलिस बॉन्ड और ज़रूरत हो तो ज़मानतदार लेकर थाने से ही छोड़ सकती है। गैर-जमानती अपराध में जमानत कोर्ट ही देता है।

ज़मानतदार (surety) कौन बन सकता है?

आम तौर पर कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी अपनी पहचान और पता साबित हो, और जिसके पास कोर्ट द्वारा तय रकम के लायक संपत्ति या आय का प्रमाण हो। कई कोर्ट स्थानीय ज़मानतदार को प्राथमिकता देते हैं। ज़मानतदार की ज़िम्मेदारी है कि आरोपी तारीखों पर हाज़िर रहे, इसलिए उसे यह बात समझकर ही ज़मानत देनी चाहिए।

क्या जमानत के लिए पैसे पुलिस को देने होते हैं?

नहीं। बॉन्ड या नकद ज़मानत कोर्ट के आदेश के अनुसार कोर्ट में दी जाती है, और उसकी रसीद मिलती है। अगर कोई पुलिसकर्मी या बिचौलिया जमानत के नाम पर पैसे मांगे, तो यह अवैध है। इसकी शिकायत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, संबंधित कोर्ट या एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) से की जा सकती है।

गैर-जमानती अपराध में भी जमानत मिलती है?

हाँ। “गैर-जमानती” का मतलब यह नहीं कि जमानत असंभव है, बल्कि यह कि जमानत अधिकार के रूप में नहीं, कोर्ट के विवेक से मिलती है। कोर्ट अपराध की गंभीरता, सबूत, भागने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका और आरोपी के रिकॉर्ड को देखता है।

अग्रिम जमानत कितने दिन में मिलती है?

अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS) की अर्जी पर अक्सर पहले पुलिस का जवाब मांगा जाता है। कई मामलों में कोर्ट बीच में अंतरिम सुरक्षा देता है, और अंतिम फैसले में कुछ दिन से कुछ हफ्ते लग सकते हैं। यह भी कोई तय समय नहीं है।

जमानत के बाद क्या शर्तें माननी होती हैं?

आम शर्तें हैं: हर तारीख पर हाज़िर रहना, गवाहों से संपर्क न करना, बिना अनुमति शहर या देश न छोड़ना, और कभी-कभी थाने में हाज़िरी (haajri) लगाना। शर्तें तोड़ने पर जमानत रद्द हो सकती है। ज़रूरत हो तो शर्तें बदलने के लिए उसी कोर्ट में अर्जी दी जा सकती है।

यह लेख कानून को सामान्य रूप से समझाता है और कानूनी सलाह नहीं है। हर मामला उसके अपने तथ्यों पर निर्भर करता है।